
जो व्यक्ति संत समाज रूपी तीर्थराज के प्रभाव को प्रसन्न मन से सुनते और समझते हैं तथा प्रेमपूर्वक इसमें गोते लगाते हैं, वे इस शरीर के रहते ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों फल प्राप्त कर लेते हैं।
एक ओर देवता और दूसरी ओर दैत्य और बीच में कुम्भ है अमृत का। यह समय था समुद्र मंथन का जो हम सभी को ज्ञात है। इस दिव्य मंथन से 14 रत्न निकलें। आरंभ में विष का कुम्भ निकला एवं पश्चात् अमृत का भी कुम्भ निकला। और ये दोनों ही कुम्भ मतभेद का कारण बनें। विष के लिये झगडा होता है कि यह किसे स्वीकारना होगा और अमृत के लिये झगडा हुआ कि यह किसे मिलेगा! विष का का स्वीकार हमारे भोलेनाथ ने किया एवं उसका झगड़ा शान्त हो गया किन्तु अब यह विष किसे मिलेगा यह द्वन्द्व अपने चरम पर पहुंचकर तांडव करने लगा। और आरम्भ हो गया देवताओं एवं दैत्यों के मध्य 12 वर्षों का महायुद्ध। वैसे तो द्युलोक में सम्पन्न यह युद्ध दिव्य वर्ष के अनुसार मात्र 12 दिन ही चला किन्तु देवताओं के बारह दिन मनुष्यों के बारह वर्षों के बराबर होते है अत: हमारे समय के अनुसार यह युद्ध बारह वर्षों तक चला और यही कारण बना प्रत्येक बारह वर्ष में एक बार महाकुम्भ मानाने का।
भारतीय संस्कृति में महाकुम्भ का विशेष स्थान है क्योकिं इसे मानाने के एक नहीं, दो नहीं बल्कि तीन मुख्य आकर्षण उत्त्पन्न करने वाले कारण मिलते हैं। एक तो देवताओं एवं दैत्यों के युद्ध के समय उसमे से कुछ बूँदें गिरती हैं जो बारह विभिन्न स्थानों में गिरती है जिनमे चार स्थान भूलोक पर हैं – प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक, अत एव यहाँ स्नान करने से उसी अमृत स्नान का भाव हमारे हृदय को श्रद्धा से पूर्ण कर देता है। दूसरा महत्त्व यह है कि जहाँ दो नदियों का मेल होता है उसे प्रयाग कहते हैं। उदाहरणस्वरूप:
अलकनंदा और धौलीगंगा = विष्णु प्रयाग
अलकनंदा और नंदाकिनी = नंद प्रयाग
अलकनंदा और पिंडरगंगा = कर्ण प्रयाग
अलकनंदा और मंदाकिनी = रुद्र प्रयाग
अलकनंदा और भागीरथी = देव प्रयाग
इसी प्रकार जब गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम हुआ, तो इसे त्रिवेणी संगम या प्रयागराज कहा गया।
तुलसीदास जी से जब प्रयागराज के विषय में पूछा गया, तो उन्होंने कहा—सबसे बड़ा प्रयाग ‘साधु समाज प्रयाग’ है। यह वह प्रयाग है जहाँ विभिन्न संत एकत्र होते हैं। उन्होंने इसे गंगा, यमुना और सरस्वती की अद्भुत उपमा दी है।
मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू॥
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा। सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा॥
संतों का समाज आनंद और कल्याण का स्रोत है, जो चलता-फिरता तीर्थराज (प्रयाग) है। इसमें रामभक्ति गंगा की धारा के समान शुद्ध और जीवनदायिनी है, जो आत्मा को निर्मल करती है। ब्रह्मविचार यहाँ सरस्वती के रूप में है, जो ज्ञान और चेतना का प्रवाह बनाता है। संतों का संग जीवन के पापों को हरकर परम शांति और मोक्ष का मार्ग दिखाता है। जहाँ संत एकत्र होते हैं, वहाँ ईश्वर की कृपा और आत्मिक आनंद स्वतः प्राप्त होता है।
बिधि निषेधमय कलिमल हरनी। करम कथा रबिनंदनि बरनी॥
हरि हर कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल मुद मंगल देनी॥
यहाँ विधि और निषेध रूपी कर्मों की कथा यमुना के समान कलियुग के पापों को हरने वाली है। हरि और हर की दिव्य कथाएँ त्रिवेणी के रूप में शोभा बढ़ाती हैं। इन कथाओं को सुनने से मनुष्य के सभी दुःख और कष्ट दूर हो जाते हैं। ये कथाएँ आत्मा को शांति और हृदय को परम आनंद से भर देती हैं। संतों के संग में इन कथाओं का श्रवण जीवन में कल्याण और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
बटु बिस्वास अचल निज धरमा। तीरथराज समाज सुकरमा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत सादर समन कलेसा॥
संत समाज रूपी प्रयाग में धर्म में अटल विश्वास अक्षयवट के समान है। शुभ कर्म इसके आधार हैं। यह समाज सभी के लिए हर समय और हर स्थान में सहज उपलब्ध है। इसे आदरपूर्वक अपनाने से सभी प्रकार के क्लेश दूर हो जाते हैं। यह प्रयाग चलता-फिरता तीर्थराज है। जहाँ संत हैं, वहीं प्रयाग है। कभी ये संत प्रयागराज में मिलते हैं, तो कभी आलंदी में, और कभी पुणे के धर्मश्री में। इनके सान्निध्य में मनुष्य कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होता है। इससे बड़ा मनुष्य जीवन का सदुपयोग और कुछ नहीं हो सकता।
तुलसीदास जी भी कहते हैं:
मज्जन फल पेखिअ ततकाला। काक होहिं पिक बकउ मराला॥
सुनि आचरज करै जनि कोई। सतसंगति महिमा नहिं गोई॥
संत समाज रूपी तीर्थराज में स्नान का फल तुरंत प्राप्त होता है। यहाँ आत्मा का शुद्धिकरण ऐसा होता है कि कौए कोयल और बगुले हंस बन जाते हैं। यह रूपांतरण सत्संग की महिमा का प्रमाण है, जिसे कोई छिपा नहीं सकता। सत्संग आत्मा को शांति, विवेक और कल्याण का अनुभव कराता है। इसका प्रभाव इतना गहन और दिव्य है कि यह जीवन को उच्चतम उद्देश्य तक पहुँचा देता है। इस बार के गीता मैत्री के इस संस्करण में भी संतों के शुभ संकल्पों के महाकुंभ को विविध रूपों में समेटने का प्रयास किया गया है। यह संस्करण पूर्णतः ऑनलाइन उपलब्ध है, जिसमें मुख्य आकर्षण के रूप में किड्स कॉर्नर, चित्रांजलि, और साधकों के विभिन्न अनुभवों का संकलन प्रस्तुत किया गया है। हमें विश्वास है कि पाठकों को इसे पढ़कर अत्यंत आनंद और प्रेरणा प्राप्त होगी। आप भी अपने लेख, हाथ से बनाए गए चित्र, कविताएँ आदि अगले संस्करण में प्रकाशन हेतु newsletter.geetamaitri@gmail.com पर भेज सकते हैं।